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न्यूज़ ग्राउंड विशेष
By   V.K Sharma 06/09/2018 :16:23
समलैंगिकता 157 साल पुरानी धारा 377 पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद जानिए कांग्रेस ने क्या कहा !
 






नई दिल्ली (न्यूज़ ग्राउंड ) आकाश मिश्रा : धारा 377 की वैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट ने आज ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि समलैंगिकता अपराध नहीं है। कोर्ट ने कहा कि देश में सबको समानता का अधिकार है। समाज को अपनी सोच बदलने की जरूरत है।  मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा, कोई भी अपने व्यक्तित्व से बच नहीं सकता है। समाज में हर किसी को जीने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि एलजीबीटी समुदाय को हर वो अधिकार प्राप्त हैं जो देश के किसी आम नागरिक को मिले हैं। हमें एक दूसरे के अधिकारों का आदर करना चाहिए और पुरानी धारणाओं को बदल कर नई सोच अपनाने की जरूरत है।  सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद कई नेताओं और बड़े लोगों के ट्वीट्स आने शुरू हो गए हैं। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट किया है 'एक पुराना औपनिवेशिक कानून, जो आज के आधुनिक समय में एक अनाचारवाद था, अब खत्म हो गया। यह एक उदार, सहिष्णु समाज की दिशा में बढ़ता हुआ कदम है।चीफ जस्टिक दीपक मिश्रा, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने अपने फैसले में कहा कि समलैंगिक समुदाय को भी आम नागरिकों के बराबर अधिकार हासिल हैं। बेंच ने कहा, ‘‘एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना सर्वोच्च मानवता है। समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी में रखना बेतुका है। इसका बचाव नहीं किया जा सकता। इतिहास को लेस्बियन, गे, बायसेक्शुअल और ट्रांसजेंडर (एलजीबीटी) समुदाय को वर्षों तक पीड़ा, कलंक और डर के साए में रखने के लिए माफी मांगनी चाहिए। दूसरों की पहचान को स्वीकार करने के मामले में नजरिया और मानिसकता बदलनी चाहिए। लोगों को कैसा होना चाहिए, इस नजरिए की बजाय लोग जैसे हैं, उन्हें वैसे ही स्वीकार करने की मानसिकता होनी चाहिए। सबकी अपनी पहचान है। हर व्यक्ति को गरिमा से जीने का हक। सेक्शुअल रुझान प्राकृतिक है। इस आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता। नैतिकता का सिद्धांत कई बार बहुलतावाद से प्रभावित होता है, लेकिन छोटे तबके को बहुल समाज के तरीके से जीने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है और 377 इसका हनन करता है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला पलटा था : आईपीसी की धारा 377 की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2009 में इस पर फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने दो वयस्कों के बीच सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया था, लेकिन 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। तब सुप्रीम कोर्ट ने धारा 377 के तहत समलैंगिकता को दोबारा अपराध करार दिया था। केंद्र ने मामले से खुद को अलग किया था : इस मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र ने धारा 377 पर अपना पक्ष रखने से इनकार कर दिया था। सरकार का कहना था कि यह कोर्ट ही तय करे कि धारा 377 के तहत बालिगों का समलैंगिक संबंध बनाना अपराध है या नहीं? हालांकि, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया था कि समलैंगिक विवाह, संपत्ति और पैतृक अधिकारों जैसे मुद्दों पर विचार न किया जाए, क्योंकि इसके कई विपरीत परिणाम भी सामने आ सकते हैं।



V.K Sharma
Editor in Chief
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