चंडीगढ़ हरियाणा सरकार द्वारा बृहस्पतिवार को विवादों में घिरे एचएसएससी के चेयरमैन को निलंबित किए जाने की कार्रवाई के दूरगामी परिणाम सामने आएंगे। पिछले करीब साढे तीन साल के कार्यकाल में आज पहला मौका है जब सरकार ने आगे बढक़र बेहद बोल्ड फैसला लिया है।
इस फैसले के बाद विरोधी राजनीतिक दलों के हाथ से न केवल बड़ा मुद्दा चला गया है बल्कि इस फैसले को हरियाणा की जातिगत राजनीतिक के साथ जोडक़र देखा जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि सीएम के इस फैसले में अहम भूमिका भाजपा की सत्ता व संगठन में बैठे ब्राह्मण प्रतिनिधियों ने ही निभाई है। हरियाणा के इतिहास में यह अपनी तरह का पहला घटनाक्रम है। प्रदेश की भाजपा सरकार के कार्यकाल के दौरान सबसे पहली परीक्षा रामपाल प्रकरण में हुई थी। सरकार को सत्ता संभालने के महज एक माह के भीतर हुए रामपाल प्रकरण में सरकार की खासी फजीहत हुई थी। इस घटनाक्रम के दौरान प्रदेश सरकार ने नई-नई सत्ता संभालने का तर्क तथा विपक्ष को आगे रखकर अपना पल्ला झाड़ लिया था। इसके बाद दो बार जाट आरक्षण आंदोलन में जहां हजारों करोड़ रुपए की संपत्ति नष्ट हो गई थी वहीं दर्जनों लोगों की मौत भी हुई थी। जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान हरियाणा सरकार ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। जिसके चलते विपक्षी राजनीतिक दलों ने प्रदेश सरकार पर राज्य के लोगों को जातिवाद के नाम पर बांटने का आरोप लगाया। जाट आरक्षण आंदोलन आज भी हरियाणा सरकार के गले की फांस बना हुआ है। आज भी गाहे-बगाहे जाट आंदोलन के दौरान फेल हुए पुलिसिया तंत्र को लेकर सरकार को जवाब देना पड़ता है।