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संपादक
By   V.K Sharma 16/05/2018 :16:55
अपने शरीफाना बयान पर कितना कायम रहेंगे शरीफ
 
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का सियासी सफर काफी उथल-पुथल वाला रहा है। इसे देखते हुए कहना पड़ता है कि संभवत: पाकिस्तान ही नहीं बल्कि अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी ऐसा उदाहरण आज तक देखने को नहीं मिला होगा कि एक शख्स को प्रधानमंत्री के पद से दो-दो बार पद्च्युत किया गया हो और वह लगातार लड़ाई लड़ते हुए आगे बढऩे की जीतोड़ कोशिश कर रहा है।

दरअसल भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच पनामा पेपर्स लीक मामले में घिरे पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अदालती आदेश के बाद तीसरे बार के प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त किया गया। यही नहीं बल्कि अदालत के सख्त रुख के कारण उन्हें अपनी ही सियासी पार्टी के शीर्ष पद को भी त्यागना पड़ गया है।

मानों कानूनी शिकंजा उन पर लगातार कसता चला जा रहा है और वो अब बेचैनी महसूस कर रहे हैं। ऐसे में याद करें 1999 के वो पल जबकि जनरल परवेज मुशर्रफ ने तख्तापलट कर देश की सत्ता अपने हाथों में ले ली थी और तत्कालीन प्रधानमंत्री शरीफ को हटा दिया गया था। इसके बाद उन्हें देश निकाला दिया गया और लंबे इंतजार के बाद 2007 में जब उनकी वतन वापसी हुई तो एक बार फिर सियासी गलियारे को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींचना शुरु कर दिया। शरीफ के सियासी चक्र की यादें यहां इसलिए ताजा हो आईं क्योंकि उन्होंने पहली बार माना है कि उनका मुल्क आतंकियों को न सिर्फ पनाह देता है बल्कि उन्होंने इस राज से पर्दा उठाकर मानों दुनिया को चौंकाने का काम किया है कि पाकिस्तान से गए आतंकियों ने ही 26/11 मुंबई हमले को अंजाम दिया था। गौरतलब है कि वर्ष 2008 में हुए मुंबई हमले में 166 लोगों की मौत हुई थी, जिसमें अनेक विदेशी नागरिकों ने भी जान गंवाई थी। इस हमले में एक मात्र जिंदा पकड़े गए आंतकी अजमल आमिर
कसाब ने खुद पाकिस्तानी होना कुबूला था, लेकिन तब पाक सरकार ने इससे इंकार कर दिया था कि उसके देश से गए आंतकियों ने हिंदुस्तान की सरजमीन पर कोई हमला किया है।

बहरहाल हम सबूत देते रहे और वह उन्हें नकारता रहा, लेकिन अब जबकि खुद पूर्व प्रधानमंत्री शरीफ यह कह रहे हैं कि मुंबई हमले की इबारत पाकिस्तान में ही लिखी गई और कहीं न कहीं तत्कालीन सरकार और प्रशासनिक अमला भी इससे वाकिफ रहा अत: वह भी इस हमले में बराबर का शरीक हुआ। तो क्या अंतर्राष्ट्रीय
मंच पर पाकिस्तान को आतंकी ठिकाना घोषित नहीं किया जाना चाहिए? जहां तक शरीफ के राजनीतिक सफर का सवाल है तो आपको बतलाते चलें कि उन्होंने सैन्य शासक जिया उल हक के दौर से राजनीति शुरु की, लेकिन उन्हें सफलता 1990 के दशक में आकर मिली, जब वो प्रधानमंत्री बने। तब उनका भारत के प्रति दोस्ताना नजरिया रहा, लेकिन जैसे-जैसे वो सत्ता के केंद्र में आते चले गए, उन पर कट्टरपंथियों और सेना का दबाव बढ़ता चला गया। हालात यहां तक पहुंचे कि शरीफ जब दूसरी बार प्रधानमंत्री बने तो उनका अपनापन देखते हुए भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी अपनी टीम के साथ लाहौर पहुंच गए
थे। इस बीच लाहौर समझौता भी हुआ, लेकिन तभी अचानक दुनिया ने देखा कि पाकिस्तान की ओर से कारगिल भी हो गया। इस प्रकार बनते-बनते बात बिगड़ गई और जितना करीब दोनों देश पहुंचे थे उससे सौ गुना ज्यादा दूर भी हो गए। यह अलग बात है कि कारगिल में शरीफ का हाथ नहीं रहा जिसकी पुष्टि जनरल मुशर्रफ
भी अपनी ओर से कई बार कर चुके हैं। दरअसल इन नेताओं का कहना रहा है कि पाकिस्तान में मौजूद कट्टरपंथी और उनकी समर्थक सेना उन्हें ऐसा करने नहीं देती है। यही वजह है कि मुशर्रफ ने तो आगरा में दोनों देशों के संबंध सुधारने के बाद दिल्ली स्थिति अपनी पुश्तैनी नाहर वाली हबेली भारत सरकार से देने की मांग तक रख दी थी। मतलब साफ है कि हिन्दुस्तान से दोस्ती करके कोई पाकिस्तान में सही सलामत नहीं रह सकता है। इस बात की पुष्टि अब नवाज शरीफ भी कर रहे हैं और बता रहे हैं कि उनके देश में बैठे चंद लोग किस तरह से भारत के खिलाफ साजिशें रचते हैं और आतंकी घुसपैठ के साथ हमले करवाते रहते हैं। इस सच्चाई बयां करने के बाद शरीफ का क्या होगा यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन यह सही अवसर है जबकि भारत सरकार को अंतर्राष्ट्रीय अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए, ताकि दुनिया के सामने सच्चाई लाई जा सके और मुंबई हमलों के दोषियों को कानूनी सजा दिलवायी जा सके। यहां शंका और सवाल सिर्फ यही है कि क्या शरीफ जिस शरीफाना अंदाज में मीडिया के समक्ष राज खोल रहे हैं, क्या इसी अंदाज में यही सच्चाई अदालत के समक्ष पेश कर पाएंगे?



V.K Sharma
Editor in Chief
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