ऋषिकेश में धार्मिक और अध्यात्मिक सुख के साथ ही पर्यटकों को लुभाती है वहा सुन्दरता !
नई दिल्ली (न्यूज़ ग्राउंड) आकाश मिश्रा : ऋषिकेशजिसे
देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है, देहरादून
जिले का एक प्रमुख तीर्थस्थान है। पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित इस स्थान का
हिन्दू समुदाय में बहुत अधिक धार्मिक महत्व है। प्रतिवर्ष, पूरे देश भर से भारी संख्या में पर्यटक इस स्थान के धार्मिक
स्थलों, महान हिमालय को देखने तथा गंगा नदी में डुबकी लगाने आते हैं।
हिमालय की तलहटी में स्थित ऋषिकेश कई हिन्दू देवी-देवताओं का घर है। इस स्थान के
प्राचीन मन्दिरों तथा आश्रमों की ख्याति दूर-दूर तक फैली है। इस क्षेत्र में योग
और ध्यान के केन्द्र भी है जहाँ पर अनुभवी प्रशिक्षकों द्वारा योग और ध्यान का
प्रशिक्षण नियमित रूप से दिया जाता है। हिन्दू महाकाव्य के विपरीत एक हिन्दू
मान्यता के अनुसार रावण का वध करने के पश्चात भगवान राम ने यहीं पर तपस्या की थी।
यह वही स्थान है जहाँ पर भगवान राम के छोटे भाई लक्षमण ने जूट से बने एक पुल की
सहायता से गंगा नदी पार की थी। इसलिये इल पुल को लक्षमण झूला कहा जाता है। इसे सन्
1889 में रस्सियों की सहायता से बनाया गया था जिसे बाद में सन् 1924 में लोहे के झूलने वाले पुल के रूप में पुनर्निर्मित किया गया।ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेशद्वार माना जाता है। कहा
जाता है कि इस स्थान पर ध्यान लगाने से मोक्ष प्राप्त होता है। हर साल यहाँ के
आश्रमों में बड़ी संख्या में तीर्थयात्री ध्यान लगाने और मन की शान्ति के लिए आते
हैं। ऋषिकेश पर्यटन का सबसे आकर्षक स्थल है। विदेशी पर्यटक भी यहाँ आध्यात्मिक सुख
की चाह में नियमित रूप से आते रहते हैं। मान्यता है कि समुद्र मंथन के दौरान निकला
विष भगवान शिव ने इसी स्थान पर पिया था। विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया और
उन्हें 'नीलकंठ महादेव' के नाम से जाना गया। एक
अन्य किवदंती के अनुसार भगवान श्रीराम ने अपने वनवास काल के दौरान यहाँ के जंगलों
में अपना समय व्यतीत किया था। कुन्जापुरी मन्दिर हिन्दू देवी सती को
समर्पित है जिन्हें शिवालिक पहाड़ियों की 13 सबसे
महत्वपूर्ण देवियों में से एक माना जाता है। एक किंवदन्ती के अनुसार देवी सती का
धड़ उस समय यहाँ गिर गया था जिस समय उनके पति हिन्दू देवता शंकर उनके शरीर को
कैलाश पर्वत ले जा रहे थे। मन्दिर को उसी स्थान पर बनाया गया है जहाँ पर भगवान
शंकर द्वारा उनका शव ले जाते समय उनका धड़ गिरा था। पर्यटक नीलकंठ महादेव मन्दिर
भी देख सकते हैं जो पंकजा और मधुमती नदियों के संगम स्थल पर स्थित है। इस मन्दिर
को विष्णुकूट, मणिकूट और ब्रह्माकूट की
पहाड़ियाँ चारों ओर से घेरे हुये हैं। इस मन्दिर में श्रृद्धालु हिन्दू पर्व
शिवरात्रि के अवसर पर भारी संख्या में आते हैं। पर्यटकों को त्रिवेणी घाट के निकट
स्थित ऋषिकुण्ड भी अवश्य जाना चाहिये। यह एक छोटा सा तालाब है जिसे देवी यमुना ने
अपने नदी के जल से कुब्ज सन्त के लिये पुरस्कार स्वरूप भरा था। पर्यटक इस तालाब
में प्राचीन रघुनाथ मन्दिर के प्रतिबिम्ब को देख सकते हैं। वशिष्ठ गुफा ऋषिकेश का
एक और प्रमुख आकर्षण है जो कि एक ध्यान केन्द्र होने के साथ-साथ साहसिक गतिविधियों
में रूचि रखने वाले लोगो को बीच कैम्प करने की जगह के रूप में प्रसिद्ध है। एक
प्रमुख ध्यान केन्द्र, श्री
स्वामी पुरुषोत्तमानन्द जी का आश्रम इस गुफा के पास ही स्थित है। इसके अलावा श्री
बाबा विशुद्धानन्द जी द्वारा स्थापित काली कमलीवाले पंचायती क्षेत्र भी इस क्षेत्र
का एक प्रमुख आकर्षण है। इसका मुख्यालय ऋषिकेश में स्थित है जबकि इसकी शाखायें
पूरे गढ़वाल में फैली हैं। यात्रियों की सुविधा के लिये आश्रम ठहरने की सुविधायें
प्रदान करता है। ऋषिकेश मे एक और आश्रम स्थित है जिसे स्वामी शिवानन्द ने स्थापित
किया था। यह आश्रम हिमालय की तलहटी में गंगानदी के किनारे स्थित है। सन् 1947 में
स्थापित ओंकारानन्द आश्रम को भी यात्री देख सकते हैं। यह आश्रम समाज और संस्कृति की
बेहतरी के लिये कार्य करता है और क्षेत्र में शिक्षा को बढ़ावा देता है। आश्रम का
प्रबन्धन स्वामी ओंकारानन्द के नेतृत्व में हिन्दू साधुओं के एक दल द्वारा किया
जाता है। यदि समय हो तो यात्री ऋषिकेश से 16 किमी की
दूरी पर स्थित शिवपुरी मन्दिर भी जा सकते हैं। हिन्दू भगवान शिव को समर्पित यह
मन्दिर पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित है। इस प्रमुख स्थान पर यात्री रिवर
राफ्टिंग का आनन्द भी ले सकते हैं। नीलकंठ महादेव मन्दिर, गीता भवन, त्रिवेणी
घाट और स्वर्ग आश्रम ऋषिकेश के कुछ अन्य प्रसिद्ध स्थान हैं। तीर्थयात्रियों के अलावा
यह स्थान साहसिक गतिविधियों में रुचि रखने वाले लोगों को भी आकर्षित करता है।
चूँकि शहर पहाड़ों के बीच स्थित है इसलिये यह ट्रेकिंग के लिये अनुकूल है। क्षेत्र
के लोकप्रिय ट्रेकिंग मार्गों में गढ़वाल हिमालय क्षेत्र, बुवानी नीरगुड, रूपकुण्ड, कौरी दर्रा, कालिन्दी
थाल, कनकुल थाल और देवी राष्ट्रीय पार्क शामिल हैं। फरवरी से
अक्तूबर के मध्य का समय इस क्षेत्र में ट्रेकिंग के लिये सर्वश्रेष्ठ होता है।
इसके अलावा यह जगह एक और साहसिक गतिविधि रिवर राफ्टिंग के लिये भी आधार है।
पेशेवरों की देखरेख में यात्री इस जल क्रीड़ा का आनन्द ले सकते हैं। ऋषिकेश में
अपने ठहराव के दौरान यात्री नदी को पार करने की रोचक साहसिक क्रीड़ा का भी आनन्द
ले सकते हैं। इस खेल के तहत लोगों को रस्सियों पर चलते हुये नदी को पार करना होता
है।यहां विश्व प्रसिद्ध योग केंद्र है। लक्ष्मण झूला, वसिष्ठ गुफा और नीलकंठ महादेव मंदिर यहां के प्रमुख पर्यटन
स्थल हैं। सुबह के समय पहाड़ियों के पीछे से निकलता हुआ सूर्य, गंगा के बहते पानी की कलकल, कोहरे से ढकी पहाड़ी
चोटियाँ, यह एक ऐसा अनुभव होता है जिसको ऋषिकेश में महसूस किया जा
सकता है। ऋषिकेश में बहती गंगा की ख़ूबसूरती तो देखती ही बनती है।ऋषिकेश से 5 किलोमीटर आगे एक झूला है, इस झूले को लक्ष्मण झूले के नाम से जाना जाता है। यह झूला
लोहे के मोटे रस्सों से बंधा है। कहा जाता है कि गंगा नदी को पार करने के लिए
लक्ष्मण ने इस स्थान पर जूट का झूला बनवाया था।ऋषिकेश में लक्ष्मण झूला पार करते ही गीता आश्रम है। यहाँ
रामायण और महाभारत के चित्रों से सजी दीवारें इस स्थान को आकर्षण बनाती हैं। यहाँ
एक आयुर्वेदिक डिस्पेन्सरी और गीताप्रेस गोरखपुर की एक शाखा भी है।नीलकंठ महादेव मंदिर ऋषिकेश के सबसे पूज्य मंदिरों में से
एक है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मंथन से निकला विष ग्रहण
किया गया था। उसी समय उनकी पत्नी, पार्वती ने उनका गला दबाया जिससे कि विष उनके पेट तक नहीं
पहुंचे। इस तरह, विष उनके गले में बना रहा।भरत मंदिर ऋषिकेश का सबसे प्राचीन मंदिर है जिसे आदि गुरु
शंकराचार्य ने बनवाया था। मंदिर का मूल रूप 1398 में तैमूर आक्रमण के
दौरान क्षतिग्रस्त कर दिया गया था।ऋषिकेश में अय्यपा मन्दिर
प्रमुख दर्शनीय स्थल है।लक्ष्मण झूले को पार करते
ही कैलाश निकेतन मंदिर है। इस मंदिर में सभी देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित
हैं।