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राजनीति
By   V.K Sharma 27/04/2019 :14:06
2019 में मोदी सरकार के सामने आने वाली किन चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा और क्या है मोदी के खिलाफ विपक्ष का चक्रव्यूह ।
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नई दिल्ली(न्यूज ग्राउंड) : भले ही यह 'अग्नि परीक्षा' संसद में मुख्य विपक्षी दल के तौर पर कांग्रेस की भूमिका की हो या फिर राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के विकल्प बनने की 2014 की चुनावी हार आज़ादी के बाद कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी हार थी.भाजपा को सरकार बनाने के लिए जोड़तोड़ करना पड़ा तो जरूरी नहीं की नरेंद्र मोदी पीएम बनें. गपशप को सही माने तो भाजपा की पुरानी अटल-आडवाणी और जोशी की लॉबी का कोई नेता प्रधानमंत्री पद की दावेदारी में सामने आ सकता है. पार्टी के अंदर की सुगबुगाहट को बाहर वाले मोदी विरोधी खूब हवा दे रहे हैं. इसलिए मोदी के दीवानों को भाजपा को पूर्ण बहुमत दिलाने की दीवानगी दिखानी होगी.भारत के सबसे ज्यादा लोकप्रिय जन नेता नरेंद्र मोदी को दुबारा प्रधानमंत्री बनने के लिए दो बड़ी चुनौतियों का सामना करना है. बाहर वाली लड़ाई मुश्किल है तो घर वाली खामोश जंग भी आसान नहीं है. बहुमत नहीं मिला तो एनडीए की जोड़तोड़ की सरकार का प्रधानमंत्री मोदी के सिवा कोई और हो सकता है.मोदी विरोधी भाजपा को हराने के प्लान ए के अलावा प्लान बी भी तैयार कर रहे हैं. ख्याली पुलाव हक़ीक़त बन जायें और एनडीए बहुमत हासिल न कर सके तो विपक्ष प्लान बी पर काम करेगा. भाजपा विरोधियों की चर्चाओं में ये बात निकल के आ रही है कि यदि बहुमत नहीं हासिल हुआ तो जोड़ तोड़ की सरकार में भाजपा का दूसरा खेमा नितिन गडकरी या राजनाथ सिंह को प्रधानमंत्री बनाना चाहेगा. समर्थन देने वाले गैर एनडीए दल राजनाथ सिंह या नितिन गडकरी को प्रधानमंत्री बनाने की शर्त रखेंगे. इसलिए प्लान बी के तहत भाजपा विरोधी भी राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी को भारी मतों से जिताने का प्रयास करेंगे.चौराहों की चर्चाओं से लेकर सोशल मीडिया पर भी गपशप है कि अटल-आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी की तिकड़ी वाले भाजपा खेमें के सक्रिय नेता बड़ी दूरदर्शिता से अपने वर्चस्व की लड़ाई जीतने के लिए खामोशी से आपसी सामंजस्य बना रहे हैं. जिसके काउंटर में नरेंद मोदी के विश्वसनीय प्रभावशाली खेमे वाले दूसरे खेमे के कद्दावर नेता राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी का कद कम करने की साजिश रच रहे हैं. आरोप लग रहे हैं कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने दो बार अली और बजरंगी जैसे विवादित बयान इसलिए दिये ताकि लखनऊ लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार गृहमंत्री राजनाथ सिंह का शियों में मजबूत जनाधार खिसक जाये.इसी तरह साधवी प्रज्ञा से भी शहीद हेमंत करकरे के खिलाफ बयान इसलिए दिलवाया गया ताकि महाराष्ट्र के मराठी वोटर के रुठने से नितिन गडकरी के जनाधार को नुकसान पंहुचे. ऐसी अप्रमाणित चर्चाओं के बीच मोदी विरोधी तब्के में राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी जैसे आडवाणी टीम के नेताओं के प्रति सहानुभूति उमड़ पड़ी है. लखनऊ में मुसलमानों का एक तबका रॉयल फैमिली और तमाम मोदी विरोधी भी राजनाथ का समर्थन कर सकते हैं.  शियों के प्रमुख धार्मिक नेता मौलाना कल्बे जव्वाद ने पिछले लोकसभा चुनाव में राजनाथ सिंह को प्रधानमंत्री बनने की ख्वाहिश ज़ाहिर ही की थी.भाजपा में दो गुटों में प्रतिस्पर्धा की अप्रमाणित चर्चाओं को सच मान लें तो नरेंद मोदी को चुनावी नतीजों के बाद घर की गुटबाजी को उभरने से रोकने के लिए पूर्ण बहुमत से जीतना जरूरी है. जोकि बड़ी चुनौती है. मोदी को हराने के लिए सबसे ज्यादा अस्सी लोकसभा सीटों वाले सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में एक दूसरे के धुर विरोधी दल सपा और बसपा मोदी को हराने के लिए एक हो रहे हैं. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी का किला तोड़ना आसान नहीं है.बिहार और अन्य प्रदेशों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के सहारे भाजपा को चुनौती दे रही है. लेकिन देश की अधिकांश जनता का मोदी पर विश्वास विपक्ष की किलेबंदी पर भारी पड़ता दिख रहा है. प्रधानमंत्री की लोकप्रियता की आंधी में एंटीइंकमबेंसी भी हवा में उड़ती नजर आ रही है. फिर भी यदि एनडीए पूर्ण बहुमत से नहीं जीतती तब जोड़तोड़ की सरकार में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने में मुश्किलें सामने आ सकती हैं.क्या नोटबंदी कालेधन पर अंतिम कार्रवाई है? हरगिज़ नहीं. नोटबंदी तो शुरुआत है. इसके बाद की चुनौतियां शायद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ज़्यादा बड़ी होंगीं. नवंबर का महीना अमूमन इतना लंबा नहीं गुज़रता, लेकिन इस बार लगा कि बहुत समय लग गया. शायद कतार में खड़े हो होकर या फिर अच्छे दिन आ जाने की ख़ुशी के मारे. जिन्हें रद्दी में बदल गए अनगिनत नोट बदलवाने हैं उन्हें लगा होगा कि सब कुछ इतनी जल्दी हो रहा है. 50 दिन उन्हें कम पड़ते दिख रहे होंगे. कुछ लोगों को लगा होगा कि बस इसी का तो इंतज़ार था, लेकिन अधिकांश तो दिन गिनते रहे कि आज एटीएम में पैसा आएंगे कि कल तक रूकना होगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का जो फ़ैसला किया है वह कई मायनों में ऐतिहासिक है. क्यों ऐतिहासिक है इसका आकलन फिर कभी. इस वक़्त तो दो खेमा है. अमर्त्य सेन से लेकर ज्यां द्रेज़ तक कई अर्थशास्त्रियों ने इसे घातक बताया है. यहां तक की आरएसएस के क़रीबी माने जाने वाले कई पत्रकार और लेखक भी उनके विरोधी दिख रहे हैं, लेकिन रिज़र्व बैंक के दो पूर्व गवर्नर वाई वी रेड्डी और डी सुब्बाराव और एक डिप्टी गवर्नर सुबीर गोकर्ण ने मोदी जी के निर्णय का समर्थन भी किया है. नरेंद्र मोदी के मुखर समर्थक देश भर में कवच की तरह सामने खड़े हैं. समर्थकों के बीच माहौल इस तरह का है मानों ये अंतिम खंदक की लड़ाई थी, जो सरकार ने जीत ली है. इसके बाद पर्दा उठेगा तो अच्छे दिन का सूर्योदय सामने होगा, लेकिन व्यावहारिक रूप से हमें समझना होगा कि नोटबंदी कोई जीवन रक्षक दवा नहीं है, एक छोटी सर्जरी मात्र है. मवाद निकालने के लिए लगाया गया एक छोटा सा चीरा. ऐसा चीरा जिसमें टांके भी नहीं लगाए जा सकते. लिहाज़ा इसमें फिर से संक्रमण का ख़तरा बहुत अधिक है. इस छोटी सर्जरी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हुई हैं. अगर इन चुनौतियों को नोटबंदी और कालेधन तक सीमित रखें तो ये आठ चुनौतियां प्रमुख दिखती हैं.
1. आने वाले दिनों की कठिनाइयां
मौतों की लंबी सूची के अलावा फ़िलहाल सब कुछ नियंत्रण में दिख रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी को ध्यान में रखना ठीक होगा. दरअसल, नियंत्रण की असली चुनौती अभी नहीं आएगी. 50 दिन बीतते-बीतते आएगी. मैं सारे देश का हाल नहीं जानता, लेकिन अपने आसपास से अनभिज्ञ नहीं हूं. दुकानदारों की कमाई तेज़ी से घटी है. कंपनियां छंटनी शुरू कर रही हैं. नौकरियां जा रही हैं. किसान हलाकान हैं. जब ये कारोबारी घाटा क्षमता से बाहर होने लगेगा, छंटनी आम हो जाएगी और किसान धान बेचकर रबी की फसल बोने के बाद खाली हो जाएगा, तब असली चुनौती सामने आएगी. जब जनधन खाते की जांच होगी, जैसा कि कहा जा रहा है और कार्रवाई होगी (क्योंकि ग़रीबों पर ही सबसे कारगर कार्रवाइयां होती हैं) तब नियंत्रण का संकट सामने आएगा. और जैसा कि मनमोहन सिंह ने कहा है कि इससे सकल घरेलू आय में भी दो प्रतिशत तक कमी आ सकती है, अगर वह सच हो गया तो? अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों से लेकर डॉलर के रेट तक की बहुत सी चुनौतियां सामने होंगीं.
2. जांच और दोषियों को सज़ा
ख़बरें आ रही हैं कि आयकर विभाग खातों की जांच कर रहा है. 50 दिन पूरे होने के बाद और सघन और पूरी जांच हो पाएगी. बहुत से दोषी पाए जाएंगे. ज्वेलरी की दुकानों पर आठ नवंबर की रात से लेकर अगले कुछ दिनों तक ख़रीददारी करने वालों की पहचान कठिन नहीं है. वे पकड़े जा सकते हैं. बैंकों तक अपनी ऊंची पहुंच वाले भी होंगे. जनधन के खातों का दुरुपयोग करने वालों के नाम पता चलेंगे, लेकिन क्या उन पर कार्रवाई होगी या आयकर वाले 'कर' छोड़कर अपनी 'आय लेकर ही मामला निपटा देंगे (जैसा कि वे अक्सर करते हैं). क्या कुछ धन्ना सेठ, कुछ अफ़सर, कुछ नेता और उनके रिश्तेदार जेल जाएंगे? याद रखिएगा कि अभी बहुत से लोग इसलिए भी ख़ुश दिख रहे हैं, क्योंकि वे इस समय परपीड़ा के सुख में हैं. लेकिन, अगर आपके अधिकारी ठीक ठाक संख्या में ऐसे लोगों की सूची सार्वजनिक नहीं करते हैं तो फिर आप कितने भी आंकड़े दे दें, वे संतुष्ट नहीं होंगे.
3. भाजपा पर लगे आरोपों की सफ़ाई
नोटबंदी की घोषणा के बाद से बहुत सी तस्वीरें छपीं और बहुत सी ख़बरें. इन सबमें नरेंद्र मोदी की अपनी पार्टी के लोग और उनकी ओर से की गई ख़रीददारियों का ज़िक्र हुआ. ईमानदारी का दावा भर पर्याप्त नहीं होगा, इस पर उनको सफ़ाई देनी होगी और आवश्यक कार्रवाई के साथ सबको संतुष्ट करना होगा. विपक्ष के आरोपों को सिर्फ़ राजनीतिक कहकर टाला जाना मोदी जी की सफ़ेद दाढ़ी में काले तिनके की तरह दिखेगा. आप भले भोले बने रहें, जनता जानती है कि आपकी पार्टी के किस मुख्यमंत्री के पास, किस मंत्री के पास कितना कालाधन है. प्रतीकात्मक ही सही क्या उनमें से किसी का नाम सामने आएगा? क्या विपक्ष का कोई बड़ा नेता भी धरा जाएगा? अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर आपकी पूरी कार्रवाई पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा.
4. विदेशों में जमा काला धन
चुनाव के समय नरेंद्र मोदी जी ने जिस कालेधन की बात कही थी, वह दरअसल देश का था ही नहीं. विदेश में जमा कालेधन का ब्यौरा था. उसी के आधार पर हर खाते में 15-15 लाख देने की बात हुई थी. आपके पास उनमें से कुछ के नाम भी हैं जो आपने बंद लिफ़ाफ़े में सुप्रीम कोर्ट को दिए हैं. कई नाम पनामा पेपर्स में आ गए हैं. इनमें से एक खातेदार का पता वही है जो भाजपा के मुख्यमंत्री रमन सिंह के घर का है. जर्मनी का प्रस्ताव और व्हिसिल ब्लोअर दोनों का प्रस्ताव मोदी सरकार के समक्ष विचाराधीन है. अब तो सरकार को दिखाना होगा कि उसका असली मक़सद कालेधन को बाहर निकालना है, इसलिए वह विदेशी खातों के बारे में भी ठोस कार्रवाई करेगी.
5. राजनीतिक दलों का काला धन
विशेषज्ञों का कहना है कि सबसे अधिक कालाधन राजनीतिज्ञों और राजनीतिक दलों के ही पास है. सारे राजनीतिक दलों ने अद्भुत सांमजस्य दिखाते हुए नियम क़ायदे ऐसे बनाए हैं कि उनके धन को काला कहा ही न जा सके. पार्षदों से लेकर पंचायत सदस्यों तक, विधायकों से लेकर सांसदों तक और राज्य के मंत्रियों से लेकर केंद्र के मंत्रियों तक अधिकांश की संपत्तियों में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी होती है. क्या मोदी सरकार इन पर भी कोई क़दम उठाएगी या फिर उन्हें हमेशा की तरह पवित्र घोषित करके चुप्पी साध ली जाएगी? 

6. बेनामी संपत्तियां और तिजोरी का धन
सभी अर्थशास्त्री इस बात पर एकमत हैं कि बड़े मगरमच्छ वो नहीं हैं, जिनके बिस्तरों के नीचे नोट बिछे हुए थे. बड़े वो हैं जिन्होंने कालांतर में देश और विदेश में बेहिसाब संपत्तियां ख़रीदी हैं. ज़मीनें, होटल, मॉल्स, कसीनो और न जाने क्या क्या. कुछ अपने नाम से, कुछ रिश्तेदारों के नाम से और कुछ साझेदारों/नौकरों के नाम से. छोटे चोरों ने तो जेवरात ही ख़रीदे. कुछ सोना और कुछ हीरा आदि. लेकिन बड़े लोगों ने तो सुना है कि सोने की ईंटें और सिल्लियां ख़रीदी हैं. वो उनके घरों में या लॉकरों में हैं. इस कालेधन को निकालने के लिए मोदी सरकार क्या करेगी. वे पकड़े जाएंगे या सिर्फ़ जनधन खाते वाले, अब तक पूरा आयकर देने वाले या गुल्लकों में पैसे बचाने वाली गृहणियां हीं नज़र में आएंगीं?

7. आने वाले समय के लिए स्पष्ट नीतियां
नोटबंदी के पहले से बाद तक कालेधन पर सरकार ने कई बार नीतियां बदलीं. पहले कहा कि 45 फ़ीसदी टैक्स देकर कालाधन सफ़ेद कर लीजिए. प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक मंचों से धमकी दी कि इसके बाद कोई पकड़ा गया तो पछताएगा, लेकिन पछताने जैसा कुछ हुआ नहीं और अब पता चल रहा है कि सिर्फ़ पांच प्रतिशत अतिरिक्त देकर (यानी 45+5=50%) भी कालेधन को सफ़ेद किया जा रहा है. सोशल मीडिया पर ही एक आकलन किसी ने साझा किया है. इसके अनुसार दो व्यक्तियों में से वो व्यक्ति घाटे में रहेगा जिसने ईमानदारी से टैक्स भरा और वो फ़ायदे में जिसने जीवन भर चोरी की और अभी 50% टैक्स देकर अपना कालाधन सफ़ेद कर रहा है. इसके अलावा सोशल मीडिया पर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. मसलन यह कि नोटबंदी के बाद अगली बारी सोने के भंडारों की है. अब संपत्ति पर सीलिंग लगने वाली है. या फिर ये कि एक ई-पास बुक बनने वाला है. ऐसा ही न जाने क्या क्या. सरकार के लिए हर मामले में स्ट्राइक करना न आसान होगा, न संभव. इसलिए सरकार को कालेधन को रोकने के लिए स्पष्ट नीतियां बनानी होंगीं और नीतियों के अनुपालन को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने पर ज़ोर देना होगा.

8. काला धन बनाने की प्रक्रिया पर रोक
हालांकि यह मानने को इस वक़्त कोई राज़ी नहीं है कि नोटबंदी से देश का सारा कालाधन वापस आ जाएगा. हो भी नहीं सकता. जब बाज़ार में 15-20 फ़ीसदी देकर अनगिनत नोट बदले जा रहे हों और कोई कार्रवाई न हो रही हो तो कौन मान सकता है कि सारा कालाधन सफ़ेद होने जा रहा है. क्या ये मान लिया जाए कि ये 15-20 फ़ीसदी का खेल पुलिस और सरकारों की नज़र में नहीं है? कौन मानेगा? लोग यह भी धीरे-धीरे समझ रहे हैं कि सिर्फ़ नोट बदले हैं. तरीक़े अभी भी वही पुराने हैं. वे सब्र कर रहे हैं कि थोड़े समय की बात है. एक बार सारे नोट छपकर आ जाएंगे फिर से खुला खेल फ़र्रुख़ाबादी. नरेंद्र मोदी जी की चुनौती है कि इस खेल को फिर शुरू होने से कैसे रोका जाए. या कम से कम इस खेल का अनुपात कम किया जाए. फ़िलहाल तो ऐसी कोई सूरत नहीं दिखती. लेकिन यह है अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती.



V.K Sharma
Editor in Chief
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