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न्यूज़ ग्राउंड विशेष
By   V.K Sharma 29/01/2019 :14:31
पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस का 88 साल की उम्र में हुआ निधन, लम्बे समय से चल रहे थे बीमार, इमरजेंसी के दौरान जेल में कैदियों को गीता पढ़कर सुनाते थे
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नई दिल्ली(न्यूज़ ग्राउंड) आकाश मिश्रा : मशहूर समाजवादी नेता और पूर्व केंद्रीय रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का 88 साल की उम्र में निधन हो गया. वो पिछले लंबे समय से बीमार चल रहे थे. वह अल्जाइमर्स (भूलने की बीमारी) से पीड़ित थे। कुछ दिन पहले उन्हें स्वाइन फ्लू भी हो गया था। अंतिम संस्कार कल किया जाएगा। इमरजेंसी के दौरान जेल में जॉर्ज कैदियों को श्रीमद्भागवतगीता पढ़कर सुनाते थे। वह मंत्री रहते हुए रिकॉर्ड 30 बार से ज्यादा सियाचिन के दौरे पर गए। मजदूर यूनियन के आंदोलन के जरिए उन्होंने भारतीय राजनीति में अपनी जगह बनाई थी. जार्ज फर्नांडिस आपातकाल के दौरान मछुआरे बनकर तो कभी साधु का रूप धारण कर और कभी सिख बनकर आंदोलन चलाते रहे. जार्ज फर्नांडिस अपने परिवार के साथ ओडिशा में थे, जब उन्हें रेडियो के जरिए आपातकाल की सूचना मिली. इसके बाद वो अपने पत्नी और बच्चों से अलग होकर आपातकाल के खिलाफ आंदोलन का हिस्सा बने. फर्नांडिस कभी मछुआरा बनकर तो कभी साधु का रूप धारण कर देश में अलग-अलग हिस्सों में घूमते रहे. इतना ही नहीं उन्होंने अपने बाल और दाढ़ी इतने बढ़ा लिए और सिख बनकर आपातकाल के खिलाफ आंदोलन को धार देने लगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फर्नांडीस के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा, "जॉर्ज साहब भारत के सर्वश्रेष्ठ राजनेताओं का प्रतिनिधित्व करते थे। वे निडर और दूरदर्शी थे। गरीबों और हाशिए पर रहने वाले लोगों की वह सबसे असरदार आवाज थे। जब मैं उनके बारे में सोचता हूं तो एक साहसी ट्रेड यूनियन नेता की छवि उभरती है जो इंसाफ के लिए लड़ा।'' 3 जून 1930 को जन्मे जॉर्ज भारतीय ट्रेड यूनियन के नेता थे। वे पत्रकार भी रहे। वह मूलत: मैंगलोर (कर्नाटक) के रहने वाले थे। 1946 में परिवार ने उन्हें पादरी का प्रशिक्षण लेने के लिए बेंगलुरु भेजा। 1949 में वह बॉम्बे आ गए और ट्रेड यूनियन मूवमेंट से जुड़ गए। 1950 से 60 के बीच उन्होंने बॉम्बे में कई हड़तालों की अगुआई की। फर्नांडीस 1967 में दक्षिण बॉम्बे से कांग्रेस के एसके पाटिल को हराकर पहली बार सांसद बने। 1975 की इमरजेंसी के बाद फर्नांडीस बिहार की मुजफ्फरपुर सीट से जीतकर संसद पहुंचे थे। मोरारजी सरकार में उद्योग मंत्री का पद दिया गया था। इसके अलावा उन्होंने वीपी सिंह सरकार में रेल मंत्री का पद भी संभाला। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार (1998-2004) में फर्नांडीस को रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई थी। कारगिल युद्ध के दौरान वह ही रक्षा मंत्री के पद पर काबिज थे।  1974 में ऑल इंडिया रेलवेमैन फेडरेशन के अध्यक्ष रहते हुए फर्नांडीस ने बड़ी रेल हड़ताल बुलाई थी। बंद का असर यह हुआ कि देशभर की रेल व्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई। हड़ताल को कई ट्रेड यूनियनों, बिजली और परिवहन कर्मचारियों ने भी समर्थन दिया था। 8 मई 1974 को शुरू हुई हड़ताल के बाद सरकार ने इसे रोकने के लिए कई गिरफ्तारियां की। एम्नेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने विरोध को कुचलने के लिए हड़ताल में शामिल 30 हजार से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया था। 1967 से 2004 तक 9 लोकसभा चुनाव जीते। इमरजेंसी में सिखों की वेशभूषा में घूमते थे और गिरफ्तारी से बचने के लिए खुद को लेखक खुशवंत सिंह बताते थे। 2003 में विपक्ष ने कैग का हवाला देते हुए जॉर्ज पर ताबूत घोटाले के आरोप लगाए। जॉर्ज ने चुनौती देते हुए कहा, "अगर आप (विपक्ष) ईमानदार हैं, तो कल तक मुझे सबूत लाकर दें। मैं इस्तीफा देने के लिए तैयार हूं।'' अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने फर्नांडीस को कारगिल ताबूत घोटाले में पूरी तरह निर्दोष करार दिया। फर्नांडीस को इमरजेंसी के दौरान बड़ौदा डाइनामाइट केस में गिरफ्तार किया गया था। जेल में रहने के दौरान वह कैदियों को श्रीमद्भागवतगीता पढ़कर सुनाते थे। फर्नांडीस ने बतौर रक्षा मंत्री रिकॉर्ड 30 से ज्यादा बार सियाचिन ग्लेशियर का दौरा किया। दिल्ली का 3, कृष्ण मेनन मार्ग उनका निवास था। यहां न कोई गेट था और न ही कोई सुरक्षाकर्मी तैनात रहता था।फर्नांडिस देश की तमाम सुरक्षा एजेंसियों से छिपकर अपने मिशन पर लगे रहे. इसी दौरान उन्होंने जनता के नाम एक अपील भी जारी की थी. आरोप है कि आपातकाल की घोषणा के बाद से ही जॉर्ज फर्नांडिस देश के अलग-अलग हिस्से में डायनामाइट लगाकर विस्फोट और विध्वंस करना चाहते थे. इसके लिए ज्यादातर डायनामाइट गुजरात के बड़ौदा से आया पर दूसरे राज्यों से भी इसका इंतजाम किया गया था. इसी बाद फर्नांडिस  और उनके साथियों को जून 1976 में गिरफ्तार कर लिया गया. इन सभी लोगों पर सीबीआई ने मामला दर्ज किया, जिसे बड़ौदा डायनामाइट केस कहा जाता है.फर्नांडिस अपने शुरुआती दौर से ही जबरदस्त विद्रोही नेता के तौर पर रहे हैं. राम मनोहर लोहिया को वो अपना आदर्श मानते थे. सोशलिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन आंदोलन के में फर्नांडिस बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे. वो अपने तेवर के जरिए 1950 तक वह टैक्सी ड्राइवर यूनियन के नेता बन गए थे. वह धीरे-धीरे गरीबों की आवाज बन गए थे.



V.K Sharma
Editor in Chief
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